अरावली पर्वत श्रृंखला पर गहराता संकट: भारत की सबसे प्राचीन पहाड़ियों का भविष्य खतरे में
नई दिल्ली / राजस्थान / हरियाणा:
भारत की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखला अरावली आज अपने अस्तित्व की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रही है। हजारों सालों से जलवायु संतुलन बनाए रखने वाली यह पर्वतमाला अब अवैध खनन, जंगलों की कटाई और तेज़ शहरीकरण के कारण लगातार कमजोर होती जा रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि समय रहते अरावली को बचाने के ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो इसके परिणाम पूरे उत्तर भारत को झेलने पड़ सकते हैं।
क्या है अरावली पर्वत श्रृंखला?
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत के गुजरात से शुरू होकर राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक फैली हुई है। इसकी कुल लंबाई लगभग 670 किलोमीटर है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार अरावली की उम्र करीब 1.5 से 2.5 अरब वर्ष है, जिससे यह दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में गिनी जाती है।
समय के साथ हुए प्राकृतिक क्षरण के कारण अरावली की ऊँचाई भले ही कम हो गई हो, लेकिन इसका पर्यावरणीय महत्व आज भी उतना ही बड़ा है।
अरावली की प्रमुख चोटियां और भौगोलिक स्थिति
अरावली पर्वत श्रृंखला की सबसे ऊंची चोटी गुरु शिखर है, जो राजस्थान के माउंट आबू में स्थित है। इसकी ऊंचाई लगभग 1,722 मीटर है। माउंट आबू क्षेत्र धार्मिक, ऐतिहासिक और पर्यटन की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।
अरावली का फैलाव थार मरुस्थल और उत्तर भारत के उपजाऊ मैदानों के बीच एक प्राकृतिक दीवार की तरह काम करता है।
पर्यावरण के लिए अरावली क्यों है इतनी जरूरी?
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार अरावली पर्वत श्रृंखला उत्तर भारत की जीवनरेखा है। इसके प्रमुख पर्यावरणीय लाभ इस प्रकार हैं:
थार मरुस्थल को पूर्वी भारत की ओर बढ़ने से रोकती है
मानसून की वर्षा को संतुलित करने में मदद करती है
भूजल recharge में अहम भूमिका निभाती है
दिल्ली NCR में प्रदूषण को कम करने में सहायक
तापमान संतुलन बनाए रखती है
यदि अरावली नष्ट होती है, तो उत्तर भारत में जल संकट और भी गहरा सकता है।
जैव विविधता का महत्वपूर्ण केंद्र
अरावली क्षेत्र केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जैव विविधता का बड़ा केंद्र भी है। यहां कई तरह के वन्यजीव पाए जाते हैं, जिनमें शामिल हैं:
तेंदुआ
नीलगाय
सियार
लोमड़ी
सैकड़ों पक्षी प्रजातियां
इसके अलावा यहां कई दुर्लभ औषधीय पौधे और पेड़ भी पाए जाते हैं, जो पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग किए जाते हैं।
अरावली पर मंडराते सबसे बड़े खतरे
बीते कुछ दशकों में अरावली पर्वत को सबसे ज्यादा नुकसान मानव गतिविधियों से हुआ है।
1. अवैध खनन
राजस्थान और हरियाणा के कई हिस्सों में अरावली में पत्थर और खनिजों का अवैध खनन बड़े पैमाने पर किया गया। इससे पहाड़ों की संरचना कमजोर हो गई।
2. जंगलों की कटाई
तेजी से बढ़ते शहरीकरण के कारण अरावली के जंगल लगातार खत्म हो रहे हैं। इससे वन्यजीवों का प्राकृतिक आवास भी नष्ट हो रहा है।
3. रियल एस्टेट और निर्माण कार्य
दिल्ली NCR और गुरुग्राम जैसे क्षेत्रों में बड़े-बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स ने अरावली को भारी नुकसान पहुंचाया है।
4. प्रदूषण और जल संकट
जंगलों के कटने से बारिश का पानी जमीन में नहीं जा पा रहा, जिससे भूजल स्तर गिरता जा रहा है।
ऐतिहासिक और धार्मिक धरोहर पर असर
अरावली क्षेत्र में स्थित दिलवाड़ा जैन मंदिर, प्राचीन राजपूत किले और कई ऐतिहासिक स्थल भी इस संकट से प्रभावित हो रहे हैं। पर्यावरणीय नुकसान का सीधा असर पर्यटन उद्योग पर भी पड़ रहा है।
सरकार और कानून क्या कहते हैं?
अरावली के संरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट और नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) कई बार सख्त निर्देश दे चुके हैं। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर नियमों का पालन पूरी तरह नहीं हो पा रहा है।
पर्यावरणविदों का मानना है कि केवल कानून बनाना काफी नहीं है, बल्कि ईमानदार क्रियान्वयन और जनभागीदारी भी जरूरी है।
विशेषज्ञों की राय
पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार यदि अरावली को बचा लिया गया तो:
दिल्ली NCR में प्रदूषण कम हो सकता है
जल संकट से राहत मिल सकती है
जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम किया जा सकता है
उनका कहना है कि अरावली का संरक्षण केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि मानव जीवन से जुड़ा सवाल है।
निष्कर्ष
अरावली पर्वत श्रृंखला भारत की प्राकृतिक धरोहर है, जिसे बचाना आज की सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है। यह केवल पहाड़ों की लड़ाई नहीं, बल्कि जल, जंगल और जीवन की सुरक्षा का सवाल है। यदि अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका भारी खामियाजा भुगतना पड़ेगा।